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दृढ़संकल्प

महेश अपने छोटे से गाँव मीठापुर मे अपने परिवार के साथ खुशी पूर्वक जीवन व्यतीत कर रहा था। उसके परिवार मे उसकी पत्नी, एक दस साल का बेटा राहुल और एक गाय थी जिसका नाम उसने गोमती रखा था और जिसे वह अपने परिवार का हिस्सा मानता था। गोमती काफी सीधी गाय थी और करीब बीस लीटर दूध देती थी, जिसमे से महेश कुछ अपने लिये रखकर बाकी बेच देता था। उसकी जरुरतें काफी सीमित थी, इसलिये खेती से जो उपज होती और दूध बेच कर जो पैसे मिलते उससे उसका गुजारा हो जाता था।

महेश मेहनती था। रोज सवेरे वह चार बजे उठ जाता। सबसे पहले वह गोमती को चारा डालकर सीधा अपने खेत की ओर काम पर निकल जाता। दिनभर वह खेत में मेहनत करता और शाम मे घर लौट कर अपनी गाय गोमती की देख भाल करता। इस काम मे उसकी पत्नी सरला भी उसका हाथ बँटाती थी।

बेटेराहुल को भी गोमती से काफी लगाव था। दिन में वह स्कूल से आता और हाथ-पैर धोकर खाने के बाद सीधा गोमती के पास जाता। वह उसे पानी पिलाता और खने के लिये अपने हाथों से उसे चारा देता। गोमती भी दोपहर बाद काफी बेसब्री से उसका इंतजार करती थी। जीवन खुशीपूर्वक और सुकून से व्यतीत हो रहा था कि अचानक एक दिन राहुल स्कूल से आया और बेहोश हो कर गिर पड़ा। आज स्कूल में भी उसे दो बार चक्कर आये थे। उसकी तबियत खराब हो गयी थी। गोमती भी काफी बैचैन थी। आज राहुल उसके पास नहीं आया था।

महेश उस समय खेत में काम कर रहा था। पड़ोस के हरिहर चाचा ने उसे ये खबर दी। वह भागा-भागा घर आया। राहुल बेहोश था। वह आँखे नही खोल पा रहा था। उसे तुरंत ही गाँव से थोड़ी दूर एक क्स्बे में एक डाक्टर के पास ले जाया गया। डाक्टर ने उसे इंजेक्शन और दवाई दी। होश आते ही वो गोमती को ढ़ूढ़ रहा था। उसकी आवाज भी ठीक से नही निकल पा रही थी। महेश परेशान था, क्योकि कस्बे के डाक्टर ने उसे शहर ले जाकर राहुल का ईलाज कराने को कहा था। महेश घर लौटकर कुछ पैसो का इंतजाम करके शहर जाने कि तैयारी में जुट गया। शहर मे उसके एक रिश्तेदार रहते थे जो वहाँ किसी फैक्ट्री में काम करते थे। वो उन्हें वहाँ अपने पास ठहराने को राजी हो गये। दूसरे ही दिन महेश राहुल को ले कर शहर के लिये निकल पड़ा। जाने से पहले उसने गोमती को चारा वगैरह डाल कर पत्नी सरला से बोला कि हमारे वापस आने तक तुम्हें ही इसका सारा ख्याल रखना है। सरला ने हाँ में सिर हिलाया। वह उदास और परेशान थी। गोमती भी बैचैन थी। उसे एहसास था कि राहुल कफी बीमार है। उसने भी दो दिनों से ठीक से चारा नही खाया था। महेश और राहुल शहर पहुँच गये। वहाँ उसका ईलाज शुरु हो गया। बीमारी काफी गंभीर थी और ईलाज में समय भी काफी लंबा लगना था। उसे हर हफ्ते दो दिनो के लिये शहर जाना पड़ता था। ईलाज का खर्च भी काफी ज्यादा था। महेश और सरला काफी परेशान थे। कर्ज बढ़ता जा रहा था और इस बीच खेती पर पर्याप्त समय न दे पाने के कारण अनाज की उपज भी कम हो गई थी। गोमती भी काफी उदास थी और आजकल उसने चारा खाना भी काफी कम कर दिया था। उसकी देख भाल भी ठीक से नही हो पा रही थी। नतीजा यह हुआ कि वो अब दूध भी कम दे पा रही थी और दूध से होने वाली आमदनी भी कम हो गयी थी।

इसी तरह से तीन महीने बीत गये। ईलाज का खर्च बढ़ता ही जा रहा था और आमदनी बिल्कुल बंद सी हो गयी थी। राहुल का ऑपरेशन होना था। उसके लिये महेश को बहुत सारे पैसो का इंतजाम करना था। साहुकार अब कर्ज देने को तैयार नही था बल्कि वह अपने पैसे माँग रहा था। महेश ने काफी हाथ-पैर जोड़े, बोला एक दो महीने की बात है, राहुल का अॅेपरेशन होते ही सब ठीक हो जायेगा और मै आपके सारे पैसे धीरे-धीरे चुका दूंगा। साहुकार नही माना। अब महेश के पास एक ही उपाय था। उसने अपनी जमीन बेचने का फैसला किया। जमीन बेचने से जितने पैसे मिले उससे किसी तरह राहुल का अॅअपरेश्न हो गया। राहुल अब घर आ गया था और धीरे-धीरे उसकी तबियत में सुधार होने लगी थी। उधर गोमती काफी कमजोर हो गयी थी। वो दूध भी अब काफी कम देने लगी थी। महेश काफी परेशान था। उसके पास अब जमीन नही बची थी। काम भी नही था। घर का खर्च चलाना भी मुश्किल हो रहा था उसपर से सिर पर साहुकार का कर्ज खड़ा था जो कि हर रोज तकादे के लिये घर पर आ जाता था। गोमती के लिये चारा भी खरीदना कठिन हो गया था। कई दिन तो दोनों पति-पत्नी बिना खये सिर्फ पानी पी कर ही सो गये, लेकिन राहुल को इस बात का बिल्कुल भी ऐहसास नहीं होने दिया। गोमती इस बात को समझती थी। उसने बिल्कुल ही चारा खाना कम कर दिया था। वह कमजोर हो गयी थी। महेश परेशान था। कई बार हरिहर चाचा ने उसे बोला कि गोमती को अब बेच दो, क्योंकि उसका चारा भी खरीदना अब तुम्हारे लिये मुश्किल हो रहा है और कम खाने की वजह से वह दिन ब दिन कमजोर होती जा रही है। गोमती को बेचने का नाम सुनते ही महेश परेशान हो जाता, उसका दिल काँप उठता था। वह बोला, “ चाचा गोमती हमारे परिवार की सदस्य है। हमारे सुख-दुख में उसने साथ दिया है। अपने परिवार के एक सदस्य को बेचने की बात कभी सोच भी कैसे सकता हूँ?” हरिहर चाचा ने उसे समझाया’ “इसी में इसकी भलाई है। तुम्हारे पास इसके चारे के लिये पैसे नही है। इसे बेचकर तुम अपना कर्ज भी चुका दोगे और बचे पैसे से कुछ धंधा भी शुरु कर सकते हो। इसी में सब की भलाई है।“



महेश वहाँ से उठ कर चला गया। उस रात उसे नींद नही आई। एक तो खाली पेट, उस पर गोमती को बेचने और अपने से दूर करने की सोच कर ही बेचैन था। राहुल को भी गोमती से कितना लगाव था। सारी रात वह सो नही पाया। सुबह वह गोमती के पास गया, उसे गौर से देखा। वह काफी कमजोर हो गयी थी, लेकिन वह काफी खुश थी क्योकि राहुल अब घर आ गया था और ठीक था। महेश ने उसे प्यार से सहलाया और उसके लिये चारा लाने को गया। चारा बस थोड़ा ही बचा था। एक वक्त के भी पेट भरने के लिये काफी नही था। महेश थोड़ी देर तक सोचता रहा। उसे हरिहर चाचा की बात समझ मे आई। उसने जो भी बचा हुआ चारा था उसे प्यार से गोमती के आगे डाल दिया और उसे खाते देखता रहा। काफी दिनो बाद आज गोमती ठीक से खा रही थी। चारा अब समाप्त हो गया था। उसके पास पैसे भी नही थे और काम भी नही था।

हरिहर चाचा ने शहर से एक खरीददार को बुला लिया था जिसका दूध का व्यापार था। उसने महेश के हाथ में पैसे पकड़ाये और गोमती को अपने साथ लेकर चल दिया। महेश कुछ नहीं बोला। वह बस गोमती को दूर जाते देखता रहा। वो बेबस था। उसके आखों से आँसू बह रहे थे।

उसने परिस्थिति से हार नहीं मानी। अपने जीवन की शुरुआत फिर से नये सिरे से करने की ठान ली। सबसे पहले तो उसने साहुकार के कर्ज चुकाये और बचे हुए पैसे से उसने लकड़ी का सामान बनाने के औजार खरीदे और एक छोटा सा वर्कशाप खोल लिया, जिसका नाम उसने गोमती वुड वर्क्स रखा। क्योकि, शहर जाकर उसने देखा था कि कई सारी दुकाने जिसमे लकड़ी से बने सामान अच्छे दामो मे बिकते थे और सबसे बड़ी बात कि इस काम का उसे थोड़ा बहुत हुनर भी था।

वो शहर जाता, वहाँ के दुकानदारो से छोटे-छोटे आर्डर ले कर आता और दिन रात मेहनत करके वो सामान तैयार करके उसे बेचने के लिये उन्हें दे आता। उसकी कारीगरी अच्छी थी और उसके बनाये सामान शहर में अच्छे दामों में बिकने लगे। दुकानदारों को ज्यादा मुनाफा होने लगा और महेश को ज्यादा काम मिलने लगा। धीरे-धीरे काम इतना ज्यादा आने लगा कि उसने और भी कारीगर रख लिये।

राहुल भी अब बिल्कुल ठीक हो गया था और स्कूल भी जाने लगा था। लेकिन स्कूल से लौटने के बाद गोमती के बिना उसे काफी सूना सा लगता। अभी भी उसे लगता कि गोमती उसका इंतजार कर रही है, उसे चारा देना है और पानी पिलाना है।

देखते ही देखते दो साल बीत गये और इन दो सालो में गोमती वुड वर्क्स का नाम काफी फैल गया। काम काफी ज्यादा आ रहा था। अब महेश के पास बीस कारीगर काम करते थे। सरला भी उसका पूरा साथ देती थी और उसके कामों में उसका हाथ बटाती थी। उसकी आमदनी अच्छी हो गयी थी, उसने काफी पैसे भी जमा कर लिये थे। आज वह हरिहर चाचा के साथ शहर, दूध वाले व्यापारी के पास, गोमती को वापिस खरीद कर लाने गया था। उसने उसे मुहमाँगी कीमत दी और गोमती को लेकर आ गया। गोमती के साथ उसका एक छोटा बछ्ड़ा भी था। राहुल काफी खुश था। गोमती भी काफी खुश नजर आ रही थी, लेकिन सबसे ज्यादा खुश सरला और महेश थे। दोनो की आँखो मे आँसू थे।