story

सूरज

शयाम और सुमन सोलन के नजदीक एक छोटे से गाँव मे रहते थे। शयाम अपने खेतों मे साग–सब्जी उगाता और उसे पास वाले बाजार मे बेच कर अपनी जीवन का गुजारा करता था। उसकी पत्नी भी उसकी मदद किया करती थी।

उन दोनो की कोई संतान नहीं थी जिस कि वजह से उनका जिवन बहुत ही सूना था। उनकी जिँदगी मे काफी उदासी थी। फरवरी का महीना था,कड़ाके की ठढ पर रही थी, कहीं से गिदर की आवाज तो कहीं से सियार के बोलने की आवाज आ रही थी। उसी रात शयाम की पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया और उस नन्हें से बच्चे की आवाज सुन कर शयाम तो आंनद विभोर ही हो गया।

उन्होंने अपने बेटे का नाम सूरज रखा, जिस ने उन दोनों की दुनिया में उजाला कर दिया। उस दिन से शयाम और सुमन को अपनी कड़ी मेहनत कम लगने लगी। दोनों पहले से अधिक मेहनत करने लगें ताकि उनकी आमदनी बढ जाये और वो सूरज कि और ज्यादा देखभाल कर पाये।

सूरज अब तीन साल का हो गया था। एक शाम को उसके माता-पिता ढ्लते सूरज को देख रहे थे और मन ही मन सूरज के भविष्य के बारे मे सोच रहें थे। शयाम ने अपनी पत्नी से बोला कि हमारा बेटा बड़ा हो कर क्या बनेगा, क्या वह भी बड़ा हो कर हमारी तरह खेती करेगा। क्या हम उसका भविष्य अपने से बेहतर नहीं बना सकते है, यह सब सोचकर उन दोनों का मन विचलित हो गया।

सुमन ने उसकी बात सुनकर अपना सिर हिला दिया और कहाँ मेरा बेटा अपने पिता कि तरह हि अच्छा आदमी बन जाये बस उसे और कुछ नहीं चाहिये। पत्नी की बात सुनकर उसका मन खुश हो गया, तुम ने सही कहा मैं भी चाहता हूँ कि मेरा बेटा शहर के किसी बड़े स्कूल मे पढे और बड़ा हो कर अच्छा इंसान बने, लेकिन हमारे पास ईतने पैसे कहाँ है।

शयाम उठ कर खड़ा हो गया और तभी सूरज को आता देख दोनों माता - पिता खुशी से फुले ना समाये। सूरज बड़ा ही खुशमिजाज बच्चा था, उस के घुँघराले बाल उसके चेहरे पे बड़ा सोभते थे। एक दिन उसके माता-पिता खेतों मे काम कर रहे थे और सूरज पास मे ही मिट्टी से घरौदा बना रहा था, तभी उस ने किसी के कदमों कि आहट सुनाई दी लेकिन वह अपने खेल मे इतना मग्न था कि उस ने ध्यान ही नहीं दिया।



वह अजनबी उसी गाँव की तरफ आ रहा था, और कुछ देर बाद सूरज के पास आ कर वह रुक गया, पर सूरज अपने घरौदें बनाने मे इतना व्य्स्त था कि सिर उठा कर उपर देखना भी जरुरी नहीं समझा , तभी उसे कुछ ऐहसास हुआ और उसने उपर उस इंसान की तरफ देखा और बोला अगर आप एक कदम भी आगे बठाते तो मेरा घरौंदा ही टूट जाता। तुम कौन हो ? तुम्हरा नाम क्या है? ”सूरज ने पूछा।

बिना पलके झुकाये सूरज उस अजनबी की तरफ एक टक लगाये देखे जा रहा था, एक बार उसके पिता शहर से मिठाई ले के आये थे और जिस कागज मे मिठाई थी उस पे बनी तस्वीर उस अजनबी से हुँ बहू मिलती थी।

असल मे वह अजनबी शहर से छुट्टीया बिताने आया था, वह अपने घोड़े पे सवार हो के यहाँ तक निकल आया था.वह नौजवान बड़ा ही भला दिख रहा था। सूरज को उसने गोद मे उठाना चाहा पर सूरज पिछे हट गया और बोला अब मै बच्चा नहीं हुँ जो गोद मे चठु। मेरे बाबा किसी अजनबी कि गोद मे चढने से मना करते है, उस अजनबी ने पूछाँ कहाँ हैं तुम्हारे बाबा? सूरज ने खेत की तरफ ईशारा करते बोला कि मेरे बाबा वहा काम करते हैं।

सूरज ने उस से पुछा आपका नाम क्या है। उस ने बोला, “रमेश चंद।“ पर सूरज के लिये ये नाम पुकारना कठिन था, उस अजनबी ने बोला कि तुम मुझे बस रमेश ही बोलो, और ले चलो मुझे अपने बाबा के पास.

अब सूरज आगे आगे चल रहा था और रमेश उस के पिछे पिछे उस खेत कि तरफ जाने लगे। रास्ते मे सूरज ने बोला कि आपने मेरा नाम भी नहीं पुछा?, “मेरा नाम सूरज है जो रात के अंधेरे को दुर करता है”, ईतना तो जानते होगे ना आप ?

रमेश को सूरज की बाते बरी हि दिलच्स्प लग रही थी, उसे बरा ही मजा आ रहा था सूरज से बात कर के।

कुछ देर चलने के बाद सूरज और रमेश खेतो के नजदीक पहुंच गये और जैसे हि सूरज ने अपने पिता को देखा दौड़ के आवाज लगाते हुए अपने पिता के गोद मे चढ गया। पिता के गोद से उतर कर वह अपने घर की तरफ दौड़ा और माँ माँ करता हुआ घर के अंदर घुस गया, कुछ देर मे उसकी माँ उसे गोद मे ले के बाहर आई और रमेश को देखकर उसने अपने सर पे पल्लु रख लिया।

उसके पिता ने रमेश बाबू को नम्स्ते किया, सूरज की माँ ने तुरंत हि खाट बिछाई और उस पर बैठने को कहा। उसकी माँ ने तुरंत हि चाय बनाई और रमेश बाबू और उसके बाबा को दी।

सुरेश और उसके पिता उस चरमराती हुई खाट पे बैठ कर बाते करने लगे। काफी देर बात करने के बाद रमेश ने अपने मन की बात बोली कि वो सूरज को गोद लेना चाहता है। फिर उसने अपने जिवन के बारे मे बताया कि उसका भी एक बेटा था सूरज कि तरह पर एक दुर्घटना मे उसकी मृत्यु हो गयी, और आज पुरे पांच साल हो गये पर, वो और उसकी पत्नी आज तक सदमे में है।

मेरा कारोबार भी बहुत बड़ा हैं और उसे भी सम्भालने के लिये भी एक वारिश की जरुरत है तो इसी वजह से मैं सूरज को गोद लेना चाहता हूँ।

शयाम के पैरो तले जैसे जमीन ही खिसक गई और वह बस वह निचे हि देखे जा रहा था। रमेश कि बात ख्त्म होने पर उस ने बोला कि मुझे थोड़ा वक़्त चाहिये सोचने के लिये।क्युँकि हम भी अपने सूरज को बड़े स्कूल मे पढाना चाहते है और बड़ा आदमी बनाना चाहते हैं। मै ईसके माँ से विचार कर के बताऊगा।

रमेश ने बोला मै आपको पुरे सात दिन सोचने का वक़्त देता हूँ, और मै आशा करता हुँ कि आप मुझे निराश नहीं करोगे। और फिर वो चले गये।

उस रात शयाम ने अपनी पत्नी को सारी बाते बताई। सूरज की माँ ने बिल्कुल मना कर दिया, पर फिर श्याम ने उसे समझाया की हम दोनों तो सूरज को एक अच्छी ज़िंदगी नहीं दे पायेगें ,हमे सूरज की भलाई के रास्ते मे नहीं आना चाहिये।

सूरज कि माँ ने बोला कि अगर वह खुश नहीं रहा तो। मैं उसे सदा के लिये अपने से दुर नहीं जाने दे सकती। फिर शयाम ने अपनी पाकेट से एक कार्ड निकाला जिस पे रमेश बाबू का पता लिखा था और बोला कि हम जब भी चाहे सूरज को वापस ला सकते है।तुम चिंता मत करो। और उसे समझा के इस बात के लिये तैयार कर लिया और क्या कल सुबह हम सूरज से ही फुछ लेंगे उसकी मर्जी।

उस माँ के दिल को आशा थी कि सूरज जाने से इंकार कर देगा.इस बात को सोच कर वह अपने मन को तस्लली दे रही थी, और दोनों यही सोचते रहे और कब उनकी आँख लग गयी पता भी नहीं चला।

“अगली सुबह शयाम ने सूरज से पूछा कि क्या तुम्हे रमेश बाबू बहुत अच्छे लगे ?”

सूरज ने तुरंत खुश हो कर जबाब दिया , “हाँ बापू”।

“क्या तु उनके साथ शहर जायेगा?”

यह बात सुनते ही सूरज की आंखें चमक उठी ,“हाँ बापू,”। उस के स्वर मे आकांक्षा थी।

“लेकिन फिर तु हमसे कभी नहीं मिल पायेगा, “माँ ने कहा।

“क्यु माँ रमेश बाबू बहूत हि अच्छे ईसान है, जब भी मैं कहूँगा वो मुझे तुमसे मिलाने ले आयेगे“।

“उसके बापू ने बरे सख्ती से बोला “ रमेश बाबू तुझे स्कूल भेजेगें , तुझे बहुत सारी चाकलेट ,खिलौना और नई नई किताबें भी खरीद देगें लेकिन तु हम से नहीं मिल पायगा ”।

“ सूरज अपने पिता कि गोद से उतर कर फिर बोला की रमेश बाबू बहुत हि अच्छे आदमी है, जब भी मैं कहुगा वो मुझे आपसे मिलाने ले आयेगे और अगर वो मुझे स्कुल भेजेगे तो मुझे भी जमिंदार के बेटे कि तरह अच्छी अच्छी किताबे पढ्ने को मिलेगी, और शायद रमेश बाबू मुझे एक बरी सी गेद खरीद दे। है ना बापू, खरीद देंगे ना ?”

शयाम और सुमन उठ कर खेत की तरफ चल दिये, उन दोनो का मन बरा हि उदास था। पुरे दिन उनका मन खेतों मे नहीं लगा और वो शाम होने से पहले हि अपने घर को आ गये। दोनों ने सूरज को काफी लाड किया, और फिर दोनों सामने पहारी कि तरफ जा के ढलते सूरज को निहारते रहे, तभी सूरज के पिता ने बोला हम सूरज के भले के लिये ईतना बड़ा त्याग करने को तैयार हुये हैं।

दोनो उठ खरे हुए और सूरज का हाथ पकर कर अपने झोपरें कि तरफ चल दिये । हर रोज कि तरह सूरज को दुध पिलाया और फिर उसे गोद में ले के सुलाने लगी, जब वो सो गया तो उसे बिस्तर पे लिटा के जैसे जाने लगी तभी सूरज ने माँ को बुलाया और बड़ी ही मासुमियत से पुछा कि “माँ रमेश बाबू मुझे लेने सचमुच आयेगे ना।”

“हा बेटा,वह कह तो गए है।”

“वह मुझे जरुर ले जायेगें।?”

“तेरे बापू कहते है ,शायद वह ले जाए।”

उसने दिया बुझाया और सूरज को अपने गले से लगा के सो गई, लेकिन उसकी आँखो मे नींद कहा थी। शयाम भी अपने खाट पे लेट कर सोने का नाटक ही कर रहा था.

सातवें दिन रमेश बाबू पहुंच गये थे शयाम के कुटिया के पास सूरज को अपने साथ ले जाने को। सूरज बड़ा ही खुश था रमेश बाबू के साथ जाने को। उसे अपने माता –पिता के दर्द का बिल्कुल भी ऐह्सास नहीं हो रहा था।

अब दोनो पहाड़ी के पक्की सड़क पे खरे थे और अपने एकलौते बेटे को रमेश बाबू के साथ घोड़े पे चढते हुए देख रहे थे। सूरज अपने माता -पिता की तरफ देखा और मुस्करा दिया । उसे उनके दु:ख का तनिक भी अहसास नहीं हो रहा था। उसकी माँ कि आँखों मे आसूँ भरे थे, वो उसे रोकने कि बहुत कोशिश कर रही थी पर वो रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। शयाम के मुख पे गभीरता थी।

वो अपने बेटे को तब तक देखते रहे जब तक वो पहाड़ कि ओट मे ओझल न हो गया । धूप अब उनके लिये उदास हो गई थी, हर तरफ बस उदासी ही झा गई थी। जिस घर मे कल तक सूरज कि वजह से चहल- पहल थी आज सब कुछ विरान सी हो गई थी। पर ईस विरानी मे बेटे के भले के लिये त्याग की ही तस्सली थी उन दोनों के मन में।

उधर सूरज के लिये ये सब परियो की कहाँनियो की तरह थी, जब से वह सुरेश बाबू के साथ घोड़े पे बैठा था उस के सामने एक से एक आश्चर्यजनक बातें हो रही थी। रास्ते मे उस ने बहुत सारी बरी बरी ईमारते उँचे ऊँचे पहाड़ और ना जाने क्या क्या देखा। थोड़ी ही देर मे वह एक बाजार से गुजरे जिस के दोनो ओर बरी बरी दुकाने, तरह तरह के खिलौने टगें थे जिस कि कल्पना सूरज ने कभी नहीं की थी।

उस रात सूरज को एक कोमल बिस्तर लगे पलग पे सुलाया गया। अगली सुबह उसे बिस्तर पे ही नौकर ने दुध पिला दी, फिर उसे एक बहुत ही बड़े गुसलखाने मे ले जाया गया जहाँ पे पहले से ही टब में गरम पानी तैयार थी । ईन सब में सूरज को बहुत आंनद आ रहा था ।

नहाने के बाद उसे नये कपड़े मिले, नया सुट पहन कर वह बहुत ही खुश था, फिर दोनों ने नाशता किया। नाशते के टेबल पे रमेश बाबू ने उसे कांटे-छुरी से खाना सिखाया , सूरज बार बार अपने दोस्त से नई नई तरह के सवाल करता और रमेश बाबू बड़े ही विनम्र तरह से जबाब देते ।

अब उसका नामांकनं भी स्कूल में हो गया और वो स्कूल जाने लगा। उसके बहुत सारे दोस्त बन गये थे और उसके पास बहुत सारी खिलौने,किताबें,नये नये कपड़े थे जितना कि उसे गाँव मे कभी नहीं मिल पाते। अब तो बस वो अपनी नई दुनिया में मश्गुल हि हो गया था और शायद उसे अपने गाँव कि और अपने माता पिता की याद भी नहीं आती थी।

और ईधर गाँव मे उसके माता पिता हर सुबह अपने सूरज की राह जोट्ते रहते। बेटे के जाने क बाद उनकी जिंदगी मे बिल्कुल ही अंधेरा छा गया था। अभी भी वो दोनो अपनी छोटे से खेत में मेहनत करते और जिवन व्यतीत कर रहे थे।

लेकिन ईशवर को उनका अकेलापन नहीं देखा गया और अगले साल उसकी पत्नी ने एक कन्या को जन्म दिया ,जिसका नाम उन्होने “सोनी” रखा।

सोनी भी सूरज कि तरह सुंदर और प्यारी सी थी, मातापिता उसे बहुत प्यार करते , लेकिन बेटी तो हमेशा दुसरे कि अमानत होती है।

जब सोनी सोलह कि हुई तो उसके माता-पिता ने उसकी शादी कर दी और वो अपने घर चली गयी।

पर कुदरत को कुछ और ही मंजुर था। दो वर्ष बाद ही उसके पति की मृत्यु हो गयी, फिर वो अपने पिता के घर वापस आ गयी, और अपने मातापिता की सेवा मे व्य्स्त रहने लगी ताकि वो अपने दु:ख को भुल सके।

ईधर सूरज अब काँलेज जाने लगा था और पढाई लिखाई मे काफी होशियार हो गया था। अब वह शायद ही अपने मातापिता को याद करता था, पर कभी कभी वह सोचता की माँ बाबा उसे ऐसे सुट बुट मे देखते तो काफी खुश होते।

कई साल बीत गये अब सूरज रमेश बाबू के आँखों का तारा बन गया था, और उसने सारी जिम्मेदारी भी सम्भाल ली थी। सूरज अब चौबीस वर्ष का हो गया था। एक सुबह वह अपने हाथ मे अखबार ले के दौड़ता हुआ आया और बरे ही हर्श के साथ बोला कि,” चाचा,मै पास हो गया.”

उस दिन रमेश बाबू कि तबियत ज्यादा हि खराब थी । वह सूरज कि ओर देख कर बस मुस्करा दिये।

“मै पास हो गया चाचा “सूरज ने फिर अपनी बात दोहराई, और वही सोफे पे बैठ गया। पर अचानक ही रमेश बाबू को खांसी का दौरा पर गया, तुरंत हि डाँक्टर को बुलाया गया थोड़ी देर में आराम होने के बाद रमेश बाबू ने सूरज को बोला की “अब उनकी जिंदगी का कोई भरोसा नहीं और उन्हें विश्वास है कि उस से अच्छा उतराधिकारी उन्हें नहीं मिल सकता था।“

“अगले सोमवार को तुम्हे व्यापार की गुढ्ता सिखने विदेश जाना पड़ेगा,रमेश बाबू ने सूरज से कहा”।

अब रमेश बाबू के आवाज मे द्रिढ्ता आ गयी थी, इस से पहले कि उन्हे खाँसी का दौरा दुबारा आए वह अपनी बात समाप्त करना चाह्ते थे।

मै नहीं चाहता की मेरे मरने के बाद तुम्हारा कोई शत्रु रहे। मेरा एक भतीजा है कई बार पहले भी बताया है उसका नाम अमन है, जब मेरे बेटे कि मौत हो गयी थी तभी से वह अपने को मेरी संपत्ति का उतराधिकार समझता है। इसलिये मैं तुम दोनो मे अपनी दौलत बराबर बराबर बाट रहा हुँ, मुझे आशा है कि तुम अपनी बुद्धि के बल पर अब इस कारोबार को आगे ले जाओगे।

कुछ देर चुप रहने के बाद सूरज ने बोला कि चाचाजी आपने मुझ पे ईतना विश्वास कर के जो भार मेरे कंधो पे दिया है उसको मैं अपने जिवन से भी ज्यादा सभाल कर आगे ले जाउँगा। और जो आज तक आप ने मेरे लिये किया है उसको मै शब्द से बया नहीं कर सकता, मै आपको विश्वास दिलाता हुँ कि मै आपको कभी निराश नहीं होने दूँगा। बात पुरी होते हि वह कमरे से बाहर निकल गया।

सूरज अपने जाने की तैयारी करने लगा। उसके जाने का दिन आ गया। उस ने चाचा के पैर छुए और गाड़ी मे बैठ गया। विदेश मे उसने अपने को समर्पित कर दिया व्यापार की बाते सिखने मे, तभी वहाँ उसे अपने चाचा की मृत्यु का सामाचार मिला, वह सुनते हि उसे सब तरफ अंधेरा ही अंधेरा लगने लगा। उसे काफी अकेला महसूस हो रहा था।अब उसे अपने कँधो पे काफी जिम्मेदारी का अहसास हो रहा था.

सूरज प्रशिक्षण खत्म कर के दिल्ली पहुँचा तो उसे बड़ा ही सुनापन मह्सूस हो रहा था। उसे एक एक कदम पे अपने चाचा की कमी महसूस हो रही थी, हर मोड़ पे रमेश बाबू कि याद सता रही थी। उस ने सोचा की क्युँ ना कुछ दिन पहाड़ों मे बिता के हि अपने घर वापस जाये।

वह सोलन पहुँच गया और वही से एक दिन वह घुड़सवारी करता हुआ गाँव की तरफ निकल गया। सब ओर शांती थी, कोइ आदमी नहीं दिख रहा था। तभी उसे एक बाबा दिखे । उसे होटल लौट्ने कि जल्दी भी नहीं थी ईसलिए वह आराम आराम से चल रहा था।

अचानक ही उसे किसी बूढे कि चीख सुनाई परी, वह तुरंत ही घोड़े से उतर कर देखने लगा की चीख कहा से आ रही है। उस ने देखा सामने खाई मे एक बाबा गिरे हुए है वह बाहर निकलने कि कोशिश कर रहे है पर निकल नहीं पा रहे है।

सूरज ने उनकी मदद की और उन्हे बाहर निकाला। अपने थरमस मे से पानी पिलाया । बाबा को थोड़ा आराम लगा, उन्होनेँ अपने काँपते हाथ सूरज के सिर पर रख दिये।

सूरज मुस्कराते हुए उनकी तरफ देखा और बोला “ आप इतना बोझा अब किस लिए उठाते हैँ? क्या आप का कोई बेटा नहीँ हैँ जो आपकी मदद करे?”

बाबा सूरज की बात सुन कर हँसने लगे और उनकी आँखोँ से आंसू बह चले, वह लड़खड़ाती हुई आवाज में कहने लगे,” कभी मेरा भी एक बेटा था,एक प्यारा बेटा.”बाबा की आवाज धीमी होती जा रही थी, लेकिन फिर भी वो बोलते रहे”मेरा बेटा बहुत ही हँसमुख और सुंदर था। एक दिन एक बडा आदमी आया और मुझ से मेरा बेटा माँग कर ले गया, ”कहते कहते बाबा की आवाज बिल्कुल धीमी हो गयी और उनका सिर सूरज कि बाँहो मे ढुलक गया।

सूरज के मुंह से कोई शब्द नहीं निकला बस उसकी आँखो से आँसू बहे जा रहे थे और उसे पता चल गया कि ये हि उसके पिता हैं।